गयासुद्दीन बलबन | मध्यकालीन भारतीय इतिहास

गयासुद्दीन बलबन

(1266-1286)

नमस्कार दोस्तों आज हम मध्यकालीन भारतीय इतिहास के एक प्रमुख शासक गयासुद्दीन बलबन के बारें में बात करेंगे व उनसे जुड़े सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों का अध्ययन करेंगे

गयासुद्दीन बलबन एक इल्बरी तुर्की था। अपनी योग्यता और कूटनीति के कारण वह इल्तुतमिश द्वारा निर्मित चालीसा दल में शामिल हुआ। बलबन ने रजिया सुल्तान को भी अपदस्थ करने में अहम भूमिका निभाई थी और अपनी चालबाजी से नासिरुद्दीन महमूद को गद्दी पर बैठाया और उसकी मृत्यु के बाद खुद 1266 में सुल्तान बना।।

◆ गयासुद्दीन बलबल ने सिजदा और पाबोस का नियम लागू किया, जहाँ सिजदा का अर्थ सुल्तान के सामने दण्डवत झुकना व पाबोस का अर्थ कदम चूमना था।

◆ इल्तुतमिश द्वारा बनाए गए चालीसा दल( तुर्कान-ए-चहलगानी) का अंत किया। क्योकि ये सभी समय के साथ महत्वाकांक्षी हो चुके थे और सुल्तान के मार्ग में बाधा बनने लगे थे। बलबन ने छोटे छोटे अपराधों के लिए अमीरों को दंड दिए जिससे चालीसा दल का अंत होने में समय नही लगा।

◆ इल्तुतमिश ने सर्वप्रथम मेवातियों का कठोरता पूर्वक दमन किया।

◆ इसके बाद 1279 ईस्वी में तुगरिल खाँ बेग की हत्या करवा दी।

◆ बलबन ने राजत्व का सिद्धांत दिया। राजत्व से तात्पर्य है कि सुल्तान अपने शक्तियों को स्पष्ट और मजबूत करने के लिए नीतियाँ अपनाना।

◆ बलबन ने राजा के दैवीय अधिकार का समर्थन किया।

◆ बलबन ने “जिल्ले इलाही” की उपाधि धारण की जिसका अर्थ ईश्वर की छाया है।

◆ बलबन ने ईरानी त्यौहार ‘नौरोज‘ को शुरू करवाया

गयासुद्दीन बलबन | मध्यकालीन भारतीय इतिहास

◆ बलबन ने खुद को उच्च वंश का बताया और कहा जब भी मैं किसी निम्न वंश के व्यक्ति को देखता हूँ तो मेरा हाथ अपने आप तलवार पर चला जाता है।

◆ बलबन ने दीवान-ए-आरिज नामक सैन्य विभाग का गठन किया।

◆ बलबन ने गुप्तचर संगठन पर भी बल दिया, और गुप्तचर विभाग का नाम ‘बरीद-ए-मुमलिक‘ दिया और गुप्तचर अधिकारी को बरीद कहा जाता था। इनके द्वारा राज्य की सभी सूचनाएं सुल्तान तक पहुँचती थी, बलबन इन्हें नगद वेतन दिया करता था, ये सीधे बलबन के नियंत्रण में थे।

◆ बलबन ने ‘रक्त एवं लौह‘ की नीति अपनाई, जिसमें विद्रोहियों की हत्या कर उनके पत्नी व बच्चों को गुलाम बना लिया जाता था।

◆ 1286 में बलबन की मृत्यु हो गयी। बरनी लिखता है की बलबन की मृत्यु से दुखी होकर मलिकों ने अपने कपड़े फाड़ डाले और 40 दिन तक उपवास रखा।

बलबन की मृत्यु के बाद गुलाम वंश की नींव हिल गयी। सभी व्यवस्थाए बिगड़ गई। इसी का फायदा उठाते हुए 1290 में मलिक फिरोज खिलजी (जलालुद्दीन खिलजी) ने दिल्ली सल्तनत पर खिलजी वंश को नींव डाली।

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शेर शाह सूरी

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