अगस्त प्रस्ताव : 1940 || अगस्त घोषणा क्या है

अगस्त प्रस्ताव : 1940

मार्च ,1940 में कांग्रेस ने रामगढ़ (बिहार) में आयोजित वार्षिक अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर कहा कि यदि ब्रिटिश सरकार केंद्र के अंतरिम राष्ट्रीय सरकार का गठन करे तो कांग्रेस द्वितीय विश्व युद्ध में सरकार का सहयोग कर सकती है। 07 जुलाई ,1940 के कांग्रेस के पूना प्रस्ताव में भी ब्रिटिश सरकार को युद्ध में सहयोग का यह प्रस्ताव दोहराया गया। रामगढ़ अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आजाद ने की। द्वितीय विश्व युद्ध में असाधारण सफलता तथा फ्राँस, हॉलैंड और बेल्जियम के पतन के पश्चात ब्रिटेन की स्थिति अत्यंत नाजुक हो गई थी। उन्हीं परिस्थितियों में भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने के लिए ब्रिटेन ने समझौतावादी दृष्टिकोण की नीति अपनाई। 8 अगस्त,1940 को वायसराय लिनलिथगो ने भारतीयों के लिए एक घोषणा की जिसे ‘ अगस्त प्रस्ताव ’ के नाम से जाना जाता है। इसमें कांग्रेस की अंतरिम राष्ट्रीय सरकार के गठन की मांग को अस्वीकार कर दिया और एक वैकल्पिक प्रस्ताव रखा।

अगस्त प्रस्ताव के मुख्य प्रावधान 

1. भारत के लिए डोमिनियन स्टेट्स मुख्य लक्ष्य ।
2. भारतीयों को समिल्लित कर युद्ध सलाहकार परिषद की स्थापना।
3. युद्ध उपरांत संविधान सभा का गठन किया जाएगा ,जिसमे मुख्यतया भारतीय ही अपनी सामाजिक ,आर्थिक व राजनीतिक धारणाओं के अनुरूप संविधान की रूपरेखा सुनिश्चित करेंगे ।संविधान ऐसा होगा कि रक्षा , अल्पसंख्यकों को पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन दिया जाएगा ।
4. वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार किया जाएगा ।
5. अल्पसंख्यकों को आश्वस्त किया गया कि सरकार ऐसी किसी संस्था को शासन नही सौंपेगी,जिसके विरुद्ध सशक्त मत हो।
यह प्रस्ताव इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इसमें भारतीयों द्वारा स्वयं संविधान सभा गठित करने के मांग को भी स्वीकार किया गया था। राष्ट्रवादी आंदोलन में यह मांग लंबे समय से की जा रही थी।पूर्व में ‘ नेहरु रिपोर्ट ’ के द्वारा भी कांग्रेस ने अपनी स्वयं संविधान निर्माण करने की क्षमताओं को साबित किया था। दूसरा, इस प्रस्ताव में डोमिनियन स्टेट्स के मुद्दे को भी स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया।
फिर भी ,कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। जवाहर लाल नेहरू ने अगस्त प्रस्ताव के बारे में कहा कि जिस डोमिनियन स्टेट्स पर यह प्रस्ताव आधारित है वह दरवाजे में जड़ी जंग लगी कील की तरह है। अतः नेहरू के अनुसार डोमिनियन स्टेट्स का मुद्दा अप्रासंगिक हो चुका था। गांधीजी ने भी इस घोषणा की आलोचना करते हुए कहा कि इस प्रस्ताव से राष्ट्रवादियों तथा उपनिवेशी सरकार के बीच खाई और चौड़ी होगी।मुस्लिम लीग ने अगस्त प्रस्ताव में अल्पसंख्यकों को दिए गए आश्वासनों का स्वागत किया किंतु पाकिस्तान को मांग स्वीकार न किए जाने के कारण लीग ने अगस्त प्रस्ताव को आखिरकार अस्वीकार कर दिया। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार द्वारा विवशता में लाया गया अगस्त प्रस्ताव कई महत्वपूर्ण प्रावधानों के बावजूद राष्ट्रवादियों की वास्तविक अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाया और इसे अस्वीकृत कर दिया गया।

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Lokesh Tanwar

अभी कुछ ख़ास है नहीं लिखने के लिए, पर एक दिन जरुर होगा....

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